पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद में हाईकोर्ट का फैसला

पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद में हाईकोर्ट का फैसला

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने नाबालिग जुड़वां बहनों के भविष्य को उनके माता-पिता के बीच के झगड़े से ऊपर रखते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। वैवाहिक विवाद के एक मामले की सुनवाई करते हुए, उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि बच्चों को मानसिक तनाव और पारिवारिक कलह से बचाने के लिए उन्हें गुरुग्राम के एक बोर्डिंग स्कूल में दाखिला दिलाया जाए। न्यायमूर्ति संजय वशिष्ठ ने यह आदेश अपने चैंबर में दोनों लड़कियों से निजी बातचीत और उनकी भावनात्मक स्थिति को समझने के बाद दिया।

न्यायमूर्ति संजय वशिष्ठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि न्यायालय का पहला कर्तव्य बच्चों का कल्याण है। चाहे अभिभावकत्व का मामला वैध हो या अवैध। सबसे पहले न्यायालय को बच्चों के बेहतर भविष्य की चिंता करनी होगी।

बातचीत के दौरान, लड़कियों ने माता और पिता दोनों के व्यवहार को लेकर न्यायाधीश से अपनी चिंताएँ साझा कीं। अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, लड़कियों ने कई बार अपने माता-पिता को आपस में बहस करते और लड़ते हुए भी देखा है। पिता ऑफिस के काम में व्यस्त रहते हैं और देर से घर लौटते हैं, जबकि माँ ज़्यादातर घर से ही ऑनलाइन काम में व्यस्त रहती हैं।

इस वजह से लड़कियाँ अक्सर अकेलापन महसूस करती हैं। अदालत ने माना कि यह माहौल उनके कोमल मन और मानसिक विकास के लिए हानिकारक है। अदालत ने आदेश दिया कि बोर्डिंग स्कूल का खर्च माता और पिता दोनों मिलकर वहन करेंगे। दोनों पक्षों को प्रवेश प्रक्रिया पूरी करने के लिए बच्चों के साथ स्कूल जाना होगा।

अदालत ने जिला प्रशासन और स्कूल प्रबंधन को भी इस प्रक्रिया में सहयोग करने का आदेश दिया है। फिलहाल, अदालत ने यह प्रावधान किया है कि प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने से पहले पिता की सहमति से माता बच्चों को दो दिन तक अपने पास रख सकती है। इस बीच, बच्चों से मिलने के अधिकार पर बाद में अलग से निर्णय लिया जाएगा।